जय हनुमान ज्ञान गुन सागर ।जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥१॥
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उसने पुछा जिंदगी किसने बरबाद की । हमने ऊँगली उठाई और अपने ही दिल पर रख ली ।
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सच कहा था किसी ने तन्हाई में जीना सीख लो मोहब्बत जितनी भी सच्ची हो साथ छोड़ ही जाती है. |
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कभी सोचा न था की वो भी मुझे तनहा कर जायेगा!जो अक्सर परेशान देखकर कहता था.... मैं हूँ न
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कोई ठुकरा दे तो हसकर जी लेना, क्यूकि मोहब्बत की दुनिया में जबरदस्ती नहीं होती !
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एक घुटन सी होती है दिल में जब कोई दिल में तो रहता है पर साथ नहीं.!
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मुझे किस तरफ जाना है कोई खबर नहीं.... ए-दोस्तों, मेरे रस्ते खो गए….. मेरी मोहोब्बत की तरह.......!!!
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तीन ही असूल हैं मेरी ज़िन्दगी के आवेदन निवेदन और फिर भी न माने तो दे दना दन
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वक्त से हारा या जीता नही जाता, केवल सीखा जाता हैं।?
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मुझे भी ज़िन्दगी में तुम ज़रूरी मत समझ लेना, सुना है तुम ज़रूरी काम अक्सर भूल जाते हो…!!
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तेरे बाद हमारा हमदर्द कौन बनेगा, हमने तो सब छोड़ दिया तुझे पाने की जिद्द में।
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जिनको जाना होता है वो चले ही जाते है किसी के रोने से उनको कोई फर्क नहीं पड़ता
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अपनापन छलके जिस की बातों में .. सिर्फ़ कुछ ही बंदे होते है लाखों में
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फितरत तो कुछ यूं भी है इन्सान की बारिश ख़त्म हो जाए तो छतरी भी बोझ लगती है ✔️
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सोचा था न करेंगे किसी से दोस्ती! न करेंगे किसी से वादा! पर क्या करे दोस्त मिला इतना प्यारा की करना पड़ा दोस्ती का वादा
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"हैसियत की बात मत कर पगली, तेरी दौलत से बड़ा मेरा दिल है !!"
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शरीफ अगर शराफत छोड़ दे तो, अंजाम अच्छा नहीं होता!??
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आग ? लगाने वालों को कहा खबर, रुख हवा ?️ ने बदला तो राख वो भी होगे..!
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दुनिया खामोशी भी सुनती हैं, लेकिन पहले धूम मचानी पड़ती हैं. ?
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छीन लेता है हर चीज मुझसे ऐ खुदा.. क्या तू भी इतना गरीब है..??
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आज फिर मेरे शहर में बारिश हो रही है, फिर किसी आशिक़ का दिल टूटा है।??
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वक़्त आने दीजिये साजिस नहीं शिकार करेंगे! ?
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कितने शौक से छोड़ दिया तुमने बात करना जैसे सदियों से तेरे ऊपर कोई बोझ थे हम
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कुछ दोस्त पकोड़े जैसे होते हैं थोड़ा सा ध्यान ना दो तो जल जाते हैं
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सब छोड़ते ही जा रहे हैं मुझको ऐ ज़िन्दगी, तुझे भी इजाज़त है, जा जा के ऐश कर |
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लोग अच्छी तरह वाक़िफ़ हैं मेरी आदतों से रुतबा कम ही सही पर लाजवाब रखता हूँ !!"
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परख ना सकोगे ऐसी शख्सियत है मेरी, मैं उन्हीं के लिए हूं जो जाने कदर मेरी..?
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खुद से बात कर के खुद से ही झगड़ता हूँ, तुम्हारे जाने के बाद अंदर से कितना उलझता हूँ....
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वह बचपना था या इश्क मालूम नहीं, मगर वो पेन मांगने वाला बहाना आज भी कहीं जिंदा है |
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मैं भिखारी भी बन जाऊँगा तेरी खातिर, कोई डाले तो सही मेरी झोली में तुझे!
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